
अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी की सरपरस्ती में ‘हरा सोना’ साफ: वन विभाग और पुलिस की जुगलबंदी से मूक हुए मरहा के जंगल
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- बस्ती में ‘हरे सोने’ की डकैती: 5 दिन, शून्य कार्रवाई! आखिर वन विभाग और पुलिस किसे बचा रहे हैं?
- साहब की ‘सेटिंग’ से साफ हुए सागौन के पेड़: मरहा-करचौलिया में कानून को ठेंगे पर रख उजड़ा जंगल!
- जांच का ‘नाटक’ और नोटों की ‘चमक’: मरहा कटान कांड में अधिकारियों की चुप्पी के गहरे मायने!
- पर्यावरण के ‘दुश्मनों’ को पुलिस का सलाम: ठेकेदार से दोस्ती निभा रही फुटहिया पुलिस?
- मरहा कटान कांड: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी सागौन की लकड़ियाँ!
- बस्ती सदर वन रेंज: रक्षक ही बने भक्षक, सवालों के घेरे में पुलिस और वन विभाग!
- सागौन माफिया का तांडव: पुलिस मौन, वन विभाग बेबस, जनता में आक्रोश!
बस्ती। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘वृक्षारोपण महाअभियान’ को उनके ही मातहत पलीता लगाने में जुटे हैं। ताजा मामला बस्ती सदर वन रेंज के ग्राम पंचायत मरहा-करचौलिया का है, जहाँ रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। पाँच दिन बीत जाने के बाद भी अवैध कटान पर प्रशासन की चुप्पी यह चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम की जड़ों को लकड़ी माफियाओं की दीमक चाट चुकी है।
सागौन की बलि और सिस्टम का ‘मौन’
पाँच दिन पूर्व मरहा-करचौलिया के बीच भारी संख्या में बेशकीमती सागौन के पेड़ों पर बेखौफ आरा चलाया गया। ताज्जुब की बात यह है कि बिना किसी परमिट के दिन-दहाड़े जंगल का सीना चीरा गया, लेकिन वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। सूचना मिलने के बाद सदर रेंज के हल्का वन दरोगा ‘जांच’ का कोरम तो पूरा कर रहे हैं, लेकिन अब तक किसी भी ठोस कार्रवाई का न होना विभाग की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
चौकी प्रभारी फुटहिया की भूमिका पर उठ रहे सवाल
सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल के असली ‘खिलाड़ी’ फुटहिया चौकी प्रभारी हैं। आरोप है कि जब सागौन के पेड़ों की कटान हो रही थी, तब साहब मौके पर ‘पहुंचे’ तो थे, लेकिन कानून का डंडा चलाने के बजाय लकड़ी ठेकेदार के साथ ‘लेन-देन’ की मेज पर बैठ गए। चर्चा आम है कि खाकी की जेब गरम होते ही अवैध कटान को ‘अभयदान’ मिल गया और मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
जांच का विषय: कैसे रुकेगी कटान?
जब रक्षक ही माफियाओं के ‘पेरोल’ पर काम करने लगें, तो पर्यावरण की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। एक तरफ वन विभाग के अधिकारी जांच की फाइल दबाए बैठे हैं, दूसरी तरफ पुलिस की संदिग्ध भूमिका ने जिले के प्रशासनिक इकबाल पर कालिख पोत दी है।
तीखे सवाल जो जवाब मांगते हैं:
- क्या जिले के आला अधिकारियों को फुटहिया पुलिस की इस ‘साठगांठ’ की जानकारी नहीं है?
- पाँच दिन बीतने के बाद भी अब तक एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं हुई?
- क्या ‘जांच’ के नाम पर केवल समय काटा जा रहा है ताकि सबूत मिटाए जा सकें?
निष्कर्ष: मरहा-करचौलिया का यह मामला केवल पेड़ों की कटान नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों का प्रमाण है। यदि जल्द ही जिम्मेदार अधिकारियों और भ्रष्ट पुलिसकर्मियों पर गाज नहीं गिरी, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले के जंगल सिर्फ कागजों पर नजर आएंगे।














